रविवार, 6 मई 2012

                 आजादी 

कूड़े की क्या कहें कहानी क्या उसके  अरमान 

कूड़ा  तो   कूड़ा   मगर     कूड़ा    है    शैतान 

कूड़ा है शैतान  शरारत  करता है  हम  सब से 

हव़ा चले तो सड़क पर आये या गुजरे ऊपर से 

कभी कार के शीशे पर , जाम करे कभी चक्का 

सड़क पर कूड़ा फेंके कोई लगता है तब धक्का 

कूड़ेदान  में  फेंको  कूड़ा   होगी  क्या  बर्बादी 

मच्छर भी कंट्रोल में होंगे होगी तब  आजादी || 

शनिवार, 5 मई 2012

मन  से  कभी न  हारो

कल  का नहीं भरोसा जीना है आज  यारों 
डर डर  के जीना छोडो  डर  को डरा के मारो 
हँस  हँस  के हार सह लो तो जीत   है हमारी  
काली घटा घिरी तो उस पर भी रंग  डारो 
कल  का नहीं भरोसा जीना है आज  यारों 

रंगीन  सारी दुनिया आयाम  इतने सारे 
बाहर तो निकलो देखो सुन्दर सभी नज़ारे 
फूलों की क्यारियाँ है काँटों की महफ़िलें हैं 
फौलाद फूल  बन कर आतुर तुम्हें पुकारे 
राहों में धुल  फैले उनपर फुहार मारो 
कल  का नहीं भरोसा जीना है आज  यारों 

आओ  गले लगा लें खुशियाँ जो मिल   रही हैं 
स्वागत करो सभी की कलियाँ जो खिल रही है 
अरमान  होंगे पुरे जो भी सजाओ  सपने 
साहस  का साथ  जो मुफ्त मिल   रही है 
अब  जीत  है तुम्हारी    मन  से  कभी न  हारो 
कल  का नहीं भरोसा जीना है आज  यारों 

डर डर  के जीना छोडो  डर  को डरा के मारो 
डर डर  के जीना छोडो  डर  को डरा के मारो 

बुधवार, 2 मई 2012




                Nyaa Prabhaat

मन प्रशन्न अत्यंत है देखा नया प्रभात

जागने लगी है लालसा कट गई काली रात

सागर तट मुंबई बसे किसकी होगी आज

अन अधिकृत रहते सभी कहने लगा है राज



मंगलवार, 1 मई 2012

          शराबी 

अद्धे से श्रद्धा किया पौवे से जब प्रेम 
परदेशी देसी मिले लेकिन शाम की टेम
लेकिन शाम की टेम टमाटर खीरा का हो चखना 
साथ में सोडा , ठंढा पानी बोतल लाकर रखना 
पास ही पाकेट भी सुटके का जम जाये जो महफ़िल 
कुछ दिन या कुछ वर्षों ही मिल जायेगी मंजिल 
किसी सड़क पर होगा एक दिन  अपना नया नजारा 
 बिखरे बाल व्यस्त सब कपडे जैसे कोई बेचारा 
एक एक कर तन में होगी हर दिन नई बिमारी 
लोग कहेंगे बड़े अदब से देखो विपदा ने मारी 
राशन पानी नहीं बचेंगे होगा घर में फांका  
माथे पर जो चोट लगे तो लगेगा उस पर टांका 
समय से पहले सम्हल गया तो होगी नहीं खराबी 
वर्ना बेजुबान बोलेंगे आया एक शराबी || 



शनिवार, 28 अप्रैल 2012

फलसफा 

जीवन का जो फलसफा लगता है अब सफा सफा 
जीवन धन अनमोल है लेकिन सबके सब हैं खफा खफा 

उत्तम खेती माध्यम बान शिक्षा सबका एक निदान 
सदियों से चलता आया जो सबने माना इसे विधान 
लेकिन आज नहीं कुछ ऐसा सबके ऊपर आया पैसा 
रिश्वतखोरी या हो चोरी सबने माना इसे प्रधान 
दान धर्म की बात न करना मिले नहीं अब कहीं वफ़ा 
जीवन का जो फलसफा लगता है अब सफा सफा 

सादा जीवन उच्च विचार करना सबसे सद्व्यवहार 
बचपन से सुनता आया पर बदल गया सब फिर एक बार 
दकियानूसी सोच मिलेगी भड़कीले अब पहनावा 
कहते सब कुछ बदल रहा तो बदलो यह संसार 
आँखों में अब नहीं है पानी करते सब कुछ रफा दफा 
जीवन का जो फलसफा लगता है अब सफा सफा 

धमा चौकड़ी होड़ लगी है जैसे कोई मोड़ नहीं है 
कल का आलम कैसा होगा साथ सत्य भी छोड़ रही है 
मंत्र एक अपनाना होगा वापस घर को आना होगा 
संतोषम परमं सुख पाना मन के अन्दर शोर यही है 
जो भी इसको अपना लेगा करके सब कुछ रफा दफा 
जीवन धन मिल जाएगा और नहीं रहेगा खफा खफा 

 जीवन का जो फलसफा होगा फिर न रफा दफा 
जीवन का जो फलसफा होगा फिर न रफा दफा 


गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

खुल कर जी लो यार 

मरने से डरने वाके क्या ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

हर सफ़र डर कर गुजारा कहते फिरते शेर दिल 

आ गई बिपदा जरा सी खोजते चूहे का बिल 

क्या हुआ हम जो नहीं कोई तो होगा मंच पर

राह मे मिल जाए दुश्मन उससे भी हँस हँस कर मिल

दुश्मनों से दुश्मनी कर ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

हम हमारे में डूबे पर कहते हैं हम आपके 

पुण्य का परचम हाथों में काम करते पाप के 

राम के हीं नाम पर कितनों ने करतब कर डाले 

कर्म अपना छोड़ कर क्यों दंश झेलें शाप के 

शाम जो ढल जाएगी क्या ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

जीना है जो जीवन पलभर जी भर कर जी लेने दो
पीना है अमृत  का प्याला जी भर कर पी लेने दो 

हों नहीं मदहोश लेकिन कल की सोचें आज हीं 

होश हो अब हम सफ़र पर जोश भी भर लेने दो 

परदेशी पाठक कहता है खुल कर जी लो यार ।
काम यहाँ कर जाओ ऐसे जाने यह संसार ।।

बुधवार, 25 अप्रैल 2012


काश की हम पंछी बन जाते

काश की हम पंछी बन जाते
नील गगन में उड़ते जाते
सीमा सरहद कुछ न होता
हँसते गाते बस मुस्काते
काश की हम पंछी बन जाते

कुदरत का अनमोल खजाना
मकसद होता उसे सजाना
शाम सुहानी सबकी होती
गुन गुन गाते न घबराते
काश की हम पंछी बन जाते

बगिया होती सबको प्यारी
सबके सब होते अधिकारी
करते चुहल कभी आपस में
अपनों को हंस कर अपनाते
काश की हम पंछी बन जाते

अपनी सबको आज पड़ी है
अनचाही दिवार खड़ी है 

इतने ऊँचे पहुँच नहीं पर ,
पर होते तो पार कराते
काश की हम पंछी बन जाते

मेरे बारे में