रविवार, 2 दिसंबर 2012


खुल कर जी लो यार 

मरने से डरने वाके क्या ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

हर सफ़र डर कर गुजारा कहते फिरते शेर दिल 

आ गई बिपदा जरा सी खोजते चूहे का बिल 

क्या हुआ हम जो नहीं कोई तो होगा मंच पर

राह मे मिल जाए दुश्मन उससे भी हँस हँस कर मिल

दुश्मनों से दुश्मनी कर ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

हम हमारे में डूबे पर कहते हैं हम आपके 

पुण्य का परचम हाथों में काम करते पाप के 

राम के हीं नाम पर कितनों ने करतब कर डाले 

कर्म अपना छोड़ कर क्यों दंश झेलें शाप के 

शाम जो ढल जाएगी क्या ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

जीना है जो जीवन पलभर जी भर कर जी लेने दो
पीना है अमृत  का प्याला जी भर कर पी लेने दो 

हों नहीं मदहोश लेकिन कल की सोचें आज हीं 

होश हो अब हम सफ़र पर जोश भी भर लेने दो 

परदेशी  पाठक कहता है खुल कर जी लो यार ।
काम यहाँ कर जाओ ऐसे जाने यह संसार ।।

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

असमंजस में दिल्ली

जर्जर भवन बनी अब कांग्रेस हिलने लगे हैं खम्भे 

भ्रष्टाचारी  घास  उगे हैं कितने लम्बे लम्बे  ? 
टपक  रहा छत उखड़े प्लास्टर डर पैदा करते हैं 
करो  प्रार्थना   मिलकर सारे जय जननी जगदम्बे ।।
कड़ कड़ करते हैं किवाड़  जब उनको कोई खोले 
घर वाले बेखबर पड़े सब कितना कोई बोले 
उचल रहे कुछ चूहे चूं चूं खोद रहे जो जड़ को 
राजा बाजा बजा गए अब नैया डग मग डोले ।।
सारा कुनबा पडा उसी में क्या करे सोनियाँ गांधी ?
किया मरम्मत बार बार आशा की डोरी बाँधी  
लेकिन रिश्वत के छींटों नें किया दीवारें जर्जर 
ऊपर से दिग्विजय हमारे चले चलाने आंधी ।।
मनमोहन चुपचाप सदा से महिमा बड़ी निराली 
नीलकंठ बन  बैठे वे अब पीकर विष की प्याली 
कोलब्लाक आबंटन हो या टूजी  बड़ा घोटाला 
उनका तो कुछ हुआ नहीं पर अपना पॉकेट खाली ।।
तारनहार विचार किया तो मिल गई उनको माया 
आ बैठी उस छत के ऊपर लेकर भरकम काया 
बांध लिया एक और मुलायम हिलते डुलते खम्भे से 
भारत माता क्या कर लेगी कहाँ मिलेगी छाया ?
राहुल बाबा के कंधे पर टिका दिया है बल्ली 
एक हाथ में डंडा जिनके एक हाँथ में गिल्ली 
बोल रहे बडबोले जैसे आगम निगम न जाने 
कर्णधार कहते सब उनको असमंजस में दिल्ली ।।  

सोमवार, 25 जून 2012

स्वदेश 
उलीच गम को भींच आँखें खींच  सर  संधान कर 
तान लो धन्वा पुरानी हाथ रख लो म्यान पर 
चल पड़ो लेकर ध्वजा अब साज सज्जा साथ में 
बाँध लो सर पर कफ़न उसे मांग लो सौगात में ।।
आ गया तूफ़ान फिरंगी रूप ले व्यापार का 
डालता घेरा सुनहरा शर्त माया जाल का 
जाग जाओ चल पड़ो अब झेलने उस दंश को 
सामना कर कर के सम्हालो अब नहीं बिलम्ब हो 
आज न्रीप शत्रु बना है अपने हिन् संतान की 
घर के बर्तन बेच कर नहीं सोचता सम्मान की 
घर के अन्दर घर के बाहर हर तरफ जंजाल है 
ब्याध आया जाल लेकर हाल अब बेहाल है 
भ्रष्ट बन जब खेलते कभी सोचते हो देश का 
आने को है फिर गुलामी सोच उस संताप का 
स्वस्थ बन नहीं शोक कर सोचो नहीं जो कल किया 
चल पड़ो बन कर स्वदेशी राग अपना लो नया 
हे हिमालय सोच ऊँचा रहे मस्तक तेरा 
मत बहा आँसू निरंतर हिम जमने दे जरा 
आयेगा तेरा युधिष्ठिर छोड़ कर वह स्वर्ग को 
साथ में लाएगा अपने अनुज अर्जुन भीम को 
हे नरेश मत कर क्लेश तुम भी उठा लो व्रत नया 
मत बुला आहात जो कर दे भेद को समझो जरा 
आते हैं दामन को थामे बैठ जाते बज्र  बन 
बज्र का सीना बना लो कष्ट को श लेंगे हम 
अपने संसाधन सहेजो काम बनता जाएगा 
तोड़ दो जंजीर आर्थिक देश बढ़ता जाएगा ।।

रविवार, 13 मई 2012

गली का दर्द



गली नाम की चीज 
निरंतर
कटती और बंटती रहती है 
बदले हालत में 
बेमौत मरती रहती है 
गाँव हो या शहर 
गलियों पर होता  रहता है कहर 
 उसकी चीख 
सुनी अनसुनी कर 
अड़े रहते हैं 
अपने अधिकार पर ||
गली बेचारी 
अपने आप में 
सिकुड़ती सहमती रहती है 
परन्तु सोचती है 
अपनी सम्पूर्णता के लिए 
तड़पती  है 
अपनी सम्पन्नता के लिए  
बिपन्न्ता की निशानियाँ 
नालियाँ
हरदम  बजबजाती रहती हैं 
कोई छोड़ जाता है वहाँ पर 
कूड़ा 
बना जाता है वहाँ पर 
एक गड्ढा 
जैसे हो फोड़ा 
चौड़ी गलियाँ भी 
संकरी हो जाती हैं 
ऐसे में गलियाँ 
रोती और घबराती हैं 
कभी कोई बाड़ लगाता  है
फूल और पौधे लगाने के लिए 
कोई दिवार कड़ी करजाता है 
अधिकार जताने के लिए 
उलझ जाते हैं लोग 
और कभी कपडे   
नाम होता है 
उस गली का 
छोड़ जाते हैं उसे 
बेबस
रोने और शर्माने के लिए ||

सोमवार, 7 मई 2012


     माँ 

आकाश जैसा विस्तृत
मखमल जैसा कोमल
पकड़ कर चलना सिखा था
जिसका आँचल
सोचता हूँ याद कर
ममता के उस ताने बाने को
बाँध लूँ छोटी सी गठरी
कविता की
माँ को उपहार देने के लिए
याद आते ही आँचल का कोना
खिल उठता है यह दिल खिलौना
जिसके सहारे बड़ा हुआ था
याद है बचपन के वे दिन
जब माँ ही सच थी , शाश्वत थी
और उसकी हर सीख थी
एक पत्थर की लकीर
ओस भरी रातों में ठंढ से ठिठुरता था जब
माँ की आँचल में छिप जाता था तब
बिना रजाई के भी मिल जाती थी गर्माहट
और
पल भर में गहरी नींद में सो जाता था मैं
घर के बाहर कितने भी बहते थे आंसू
आँचल की ओट मिलते हीं
खिल उठती थी होठों की मुस्कान
कभी चपत भी खाया था
मगर होते थे मीठे
यादें ताज़ी हैं उनकी ,
कदम दर कदम
याद है
जब मैं निकला था पहली बार
घर से
लम्बे प्रवास के लिए
माँ की ममता आँखों से निकल कर
आँचल को भिगो रही थी
और मैं
चल पडा था भारी मन से
उसके हाथों की बनी रोटी साथ लिए
खोजता हूँ माँ को आज ,
उसी पुराने घर में जाकर
खंडहर सा दिखता है वह ,
उसके वहां न मिलने पर
चला आता हूँ वापस खाली हाथ
मायूस मगर यादों को समेटे हुए
कोसता हूँ नियति के उन नियमों को
जिसने दूर कर दिया मुझे मेरी माँ से
मगर
वह तो सदा हीं मेरे पास है
मेरे मन में , अंतर्मन में , और कण कण में
                सपना मनी मनी

अपना सपना मनी मनी  , कसे भी बन जाएँ धनी
हाथ पाँव हिलने न पाए जीवन में हो हनी हनी 
अपना सपना मनी मनी , अपना सपना मनी मनी 
बिन बादल के बरसे पानी मिले लाभ पर नहीं हो हानी
बिन मांगे सब कुछ हो हाजिर काम बने पर सदा जुबानी 
आगे पीछे लगे हों सेवक खुले भाग्य भी देकर दस्तक 
पासों की अम्बार लगी हो दुनिया बोले राजा रानी 
राम करे ऐसा हो जाये और नहीं हो देर घनी 
अपना सपना मनी मनी , अपना सपना मनी मनी

हाथों में सोने के छल्ले खाएं हम हर दिन रसगुल्ले 
जो सोचें पल में मिल जाये जीवन भर हो बल्ले बल्ले 
सेहरा भी बंध जाये सर पर वो भी ऐसा सबसे हट कर 
आलिशान महल मिल जाये रहलें उसमें खुल्ले खुल्ले 
चांदी की चौखट हो घर में वो भी एकदम नई बनी 
अपना सपना मनी मनी , अपना सपना मनी मनी

लेकन सब आसन नहीं है अपनी तो पहचान नहीं है 
जीवन जंग बना है जैसे जिसमें तो आराम नहीं है 
मेहनत के बल पर जो पाओ उसमें अपनी सभी बनाओ 
अथक परिश्रम करो जो प्यारे तन मिटटी से सनी सनी 
सपना सच हो जाएगा और खेलोगे  तुम मनी मनी 
सपना सच हो जाएगा और खेलोगे  तुम मनी मनी 

रविवार, 6 मई 2012

                 आजादी 

कूड़े की क्या कहें कहानी क्या उसके  अरमान 

कूड़ा  तो   कूड़ा   मगर     कूड़ा    है    शैतान 

कूड़ा है शैतान  शरारत  करता है  हम  सब से 

हव़ा चले तो सड़क पर आये या गुजरे ऊपर से 

कभी कार के शीशे पर , जाम करे कभी चक्का 

सड़क पर कूड़ा फेंके कोई लगता है तब धक्का 

कूड़ेदान  में  फेंको  कूड़ा   होगी  क्या  बर्बादी 

मच्छर भी कंट्रोल में होंगे होगी तब  आजादी || 

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