मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

नए अछूत

नए अछूत 

बनिया ब्राह्मण राजपूत 
राजनीति के नए अछूत 
उनकी किसको है परवाह 
चाहे निकले मुंह से आह 
लोकतंत्र में दोयम दर्जा 
चुका रहे बरसों का कर्जा 
भूल हुई क्या कहो हमारी 
मारी गई है मति तुम्हारी 
आरक्षण एक हद तक अच्छा 
लेना उसको बन कर सच्चा 
लेना उसको बन कर सच्चा 

रविवार, 9 दिसंबर 2012

गोरा काला

तन के गोरे चले गए, कर गए मन को काला ।
एक दूजे को कोस रहे हम, पडा अकल पर ताला ।।

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012


 एफ . डी . आई 

एफ . डी . आई . एफ . डी . आई . 
बोलो बोलो कहाँ से आई 
देशी हो या परदेशी तुम 
अपनी हो या कोई पराई 
एफ . डी . आई . एफ . डी . आई . 
बोलो बोलो कहाँ से आई ।

संसद में जब हुआ हंगामा 
सबने देखा सबका ड्रामा 
मनमोहन जी जित गए पर 
बन नहीं पाए ;यहाँ ओबामा 
बड़े भयंकर कहते हैं सब 
ऐसी है तेरी परछाई ।
एफ . डी . आई . एफ . डी . आई . 
बोलो बोलो कहाँ से आई ।

सकते में सारे व्यापारी 
अन्धकार में सब अधिकारी 
पक्ष बिपक्ष समझ ना आये 
दिखती है  सबकी लाचारी 
कहते  हैं आफत की पुडिया 
दुनियाँ  भर  में हो दुखदाई 
एफ . डी . आई . एफ . डी . आई . 
बोलो बोलो कहाँ से आई 

आओ अब तो राह बनी है 
पाठक को परवाह नहीं है 
हम सब हैं माटी के पुतले 
दर्द बहुत  पर आह नहीं है 
आर्थिक मोर्चा फतह करो तुम 
समझो लेकिन पीर पराई 
एफ . डी . आई . एफ . डी . आई . 
न जानें तुम  कहाँ से आई 
देसी हो या परदेसी पर 
बन कर रहना अपनी ताई ।।

रविवार, 2 दिसंबर 2012


खुल कर जी लो यार 

मरने से डरने वाके क्या ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

हर सफ़र डर कर गुजारा कहते फिरते शेर दिल
आ गई बिपदा जरा सी खोजते चूहे का बिल
क्या हुआ हम जो नहीं कोई तो होगा मंच पर
राह मे मिल जाए दुश्मन उससे भी हँस हँस कर मिल
दुश्मनों से दुश्मनी कर ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?
हम हमारे में डूबे पर कहते हैं हम आपके
पुण्य का परचम हाथों में काम करते पाप के
राम के हीं नाम पर कितनों ने करतब कर डाले
कर्म अपना छोड़ कर क्यों दंश झेलें शाप के
शाम जो ढल जाएगी क्या ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?
जीना है जो जीवन पलभर जी भर कर जी लेने दो
पीना है अमृत  का प्याला जी भर कर पी लेने दो
हों नहीं मदहोश लेकिन कल की सोचें आज हीं
होश हो अब हम सफ़र पर जोश भी भर लेने दो
परदेशी  पाठक कहता है खुल कर जी लो यार ।
काम यहाँ कर जाओ ऐसे जाने यह संसार ।।

खुल कर जी लो यार 

मरने से डरने वाके क्या ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

हर सफ़र डर कर गुजारा कहते फिरते शेर दिल 

आ गई बिपदा जरा सी खोजते चूहे का बिल 

क्या हुआ हम जो नहीं कोई तो होगा मंच पर

राह मे मिल जाए दुश्मन उससे भी हँस हँस कर मिल

दुश्मनों से दुश्मनी कर ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

हम हमारे में डूबे पर कहते हैं हम आपके 

पुण्य का परचम हाथों में काम करते पाप के 

राम के हीं नाम पर कितनों ने करतब कर डाले 

कर्म अपना छोड़ कर क्यों दंश झेलें शाप के 

शाम जो ढल जाएगी क्या ख़ाक जीवन जी सकेंगे ?
जीवन है अमृत का प्याला  खाक अमृत पी सकेंगे ?

जीना है जो जीवन पलभर जी भर कर जी लेने दो
पीना है अमृत  का प्याला जी भर कर पी लेने दो 

हों नहीं मदहोश लेकिन कल की सोचें आज हीं 

होश हो अब हम सफ़र पर जोश भी भर लेने दो 

परदेशी  पाठक कहता है खुल कर जी लो यार ।
काम यहाँ कर जाओ ऐसे जाने यह संसार ।।

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

असमंजस में दिल्ली

जर्जर भवन बनी अब कांग्रेस हिलने लगे हैं खम्भे 

भ्रष्टाचारी  घास  उगे हैं कितने लम्बे लम्बे  ? 
टपक  रहा छत उखड़े प्लास्टर डर पैदा करते हैं 
करो  प्रार्थना   मिलकर सारे जय जननी जगदम्बे ।।
कड़ कड़ करते हैं किवाड़  जब उनको कोई खोले 
घर वाले बेखबर पड़े सब कितना कोई बोले 
उचल रहे कुछ चूहे चूं चूं खोद रहे जो जड़ को 
राजा बाजा बजा गए अब नैया डग मग डोले ।।
सारा कुनबा पडा उसी में क्या करे सोनियाँ गांधी ?
किया मरम्मत बार बार आशा की डोरी बाँधी  
लेकिन रिश्वत के छींटों नें किया दीवारें जर्जर 
ऊपर से दिग्विजय हमारे चले चलाने आंधी ।।
मनमोहन चुपचाप सदा से महिमा बड़ी निराली 
नीलकंठ बन  बैठे वे अब पीकर विष की प्याली 
कोलब्लाक आबंटन हो या टूजी  बड़ा घोटाला 
उनका तो कुछ हुआ नहीं पर अपना पॉकेट खाली ।।
तारनहार विचार किया तो मिल गई उनको माया 
आ बैठी उस छत के ऊपर लेकर भरकम काया 
बांध लिया एक और मुलायम हिलते डुलते खम्भे से 
भारत माता क्या कर लेगी कहाँ मिलेगी छाया ?
राहुल बाबा के कंधे पर टिका दिया है बल्ली 
एक हाथ में डंडा जिनके एक हाँथ में गिल्ली 
बोल रहे बडबोले जैसे आगम निगम न जाने 
कर्णधार कहते सब उनको असमंजस में दिल्ली ।।  

सोमवार, 25 जून 2012

स्वदेश 
उलीच गम को भींच आँखें खींच  सर  संधान कर 
तान लो धन्वा पुरानी हाथ रख लो म्यान पर 
चल पड़ो लेकर ध्वजा अब साज सज्जा साथ में 
बाँध लो सर पर कफ़न उसे मांग लो सौगात में ।।
आ गया तूफ़ान फिरंगी रूप ले व्यापार का 
डालता घेरा सुनहरा शर्त माया जाल का 
जाग जाओ चल पड़ो अब झेलने उस दंश को 
सामना कर कर के सम्हालो अब नहीं बिलम्ब हो 
आज न्रीप शत्रु बना है अपने हिन् संतान की 
घर के बर्तन बेच कर नहीं सोचता सम्मान की 
घर के अन्दर घर के बाहर हर तरफ जंजाल है 
ब्याध आया जाल लेकर हाल अब बेहाल है 
भ्रष्ट बन जब खेलते कभी सोचते हो देश का 
आने को है फिर गुलामी सोच उस संताप का 
स्वस्थ बन नहीं शोक कर सोचो नहीं जो कल किया 
चल पड़ो बन कर स्वदेशी राग अपना लो नया 
हे हिमालय सोच ऊँचा रहे मस्तक तेरा 
मत बहा आँसू निरंतर हिम जमने दे जरा 
आयेगा तेरा युधिष्ठिर छोड़ कर वह स्वर्ग को 
साथ में लाएगा अपने अनुज अर्जुन भीम को 
हे नरेश मत कर क्लेश तुम भी उठा लो व्रत नया 
मत बुला आहात जो कर दे भेद को समझो जरा 
आते हैं दामन को थामे बैठ जाते बज्र  बन 
बज्र का सीना बना लो कष्ट को श लेंगे हम 
अपने संसाधन सहेजो काम बनता जाएगा 
तोड़ दो जंजीर आर्थिक देश बढ़ता जाएगा ।।

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