बडे ही चर्चे होते हैं शहर के और गाँव के
माल की ठंढी हवा और बरगद की छांव के
तुलना होती है हाइवे से पगडण्डी की
और मेट्रो की चमचमाती फर्श पर फिसलते पाँव की
दीये की दम तोड़ती लो को छोड़ कर कोई यूँ ही नहीं आता है
जीवन से भी कीमती रिश्ते और नाते को दाँव पर लगाता है
सफल व्यवसाई हो या हो कोई मजदूर
कुछ पल को ही सही सबका गला भर आता है
जवानी बीत जाती है जीवन की रंगरलियों में
चमकती सड़क पर, बाजार में और सुहानी गलिओं में
सेल में लुटाता है परिश्रम का पैसा
ढलती उम्र में मगर एकदिन
छिप कर आंसू बहाता है
शहर तो एक प्रेयशी है
कहीं तो मेनका और कहीं उर्वशी है
साथ निभाती है सुख के दिनों में
मगर इसकी भी अपनी कुछ बेवशी है
बुजुर्गों की आहें शहर के सुख का राज खोलती हैं
क्या खोया और क्या पाया सभी कुछ तो बोलती हैं
क्या होता है जीवन का एकाकी पन
समय के तराजू में सभी कुछ तोलती हैं
लेकिन क्या गांवों में भी सब कुछ सामान्य है
जाकर जरा देभो तो वहां बहुत कुछ असामान्य है
सभी एक दुसरे को जानते हैं मगर
एक की सफलता दुसरे को अमान्य है
बाहों में बाहें डाल कर साथ साथ तो चलते हैं
सफल होने की चाहत में आगे आने को मचलते हैं
मगर अपनी सीमाओं और मजबूरियों के कारण
अपने ही हाथों से अरमानों को कुचलते हैं
यही तो है आम आदमी की कहानी
कहीं तो है चहल पहल और कहीं है विरानी
गाँव हो या हो कोई शहर मिल जाता है अपनापन
छिपा होता है सबके सीने में इसकी कई निशानी
सोमवार, 12 जनवरी 2009
रविवार, 11 जनवरी 2009
जागो दुश्मन प्यारे
चुप चुप बैठे पाक के आका जैसे सूंघा सांप
जनता , वर्नि , दुर्रानी ने लिया था जिसको भांप
लिया था जिसको भांप नहीं है अजमल आज पराया
जिसने आकर मुंबई में सबके दिल को थर्राया
अंधा धुंध चला कर गोली कितने निर्दोष को मारा
पाकिस्तानी है वह जालिम सबको कह कर हारा
माने नहीं गिलानी अब तक होगी उनको ग्लानी
अलग थलग पड़ेंगे जग में होगी तब परेशानी
युद्ध की बातें कर के वे कमजोरी जता रहे हैं
दुनिया वाले जान गए पर धता बता रहे हैं
बाकी अभी स्वीकार है करना जो हैं मुर्दा घर में
मिटटी को मिटटी मिल जाए जाने क्या है मन में
कितना ही इनकार करें पर साबित सब होता है
आतंकवाद की धरती पर मानवता ही रोता है
सेना भी अपनी कमजोरी छिपा रही है अकड़ से
लश्कर हो या मुजाहिदीन सब बाहर उनकी पकड़ से
अगर नहीं जो सम्हले अब भी जीना दुस्कर होगा
जलने लगेगा आपका घर तो चीन भी क्या कर लेगा
जागो प्यारे दुश्मन अब भी क्यों रहते हो छिप छिप
मिला कर नजरें बातें कर लो कब तक रहोगे चुप चुप
जनता , वर्नि , दुर्रानी ने लिया था जिसको भांप
लिया था जिसको भांप नहीं है अजमल आज पराया
जिसने आकर मुंबई में सबके दिल को थर्राया
अंधा धुंध चला कर गोली कितने निर्दोष को मारा
पाकिस्तानी है वह जालिम सबको कह कर हारा
माने नहीं गिलानी अब तक होगी उनको ग्लानी
अलग थलग पड़ेंगे जग में होगी तब परेशानी
युद्ध की बातें कर के वे कमजोरी जता रहे हैं
दुनिया वाले जान गए पर धता बता रहे हैं
बाकी अभी स्वीकार है करना जो हैं मुर्दा घर में
मिटटी को मिटटी मिल जाए जाने क्या है मन में
कितना ही इनकार करें पर साबित सब होता है
आतंकवाद की धरती पर मानवता ही रोता है
सेना भी अपनी कमजोरी छिपा रही है अकड़ से
लश्कर हो या मुजाहिदीन सब बाहर उनकी पकड़ से
अगर नहीं जो सम्हले अब भी जीना दुस्कर होगा
जलने लगेगा आपका घर तो चीन भी क्या कर लेगा
जागो प्यारे दुश्मन अब भी क्यों रहते हो छिप छिप
मिला कर नजरें बातें कर लो कब तक रहोगे चुप चुप
डी डी ऐ और अनियमित कालोनी से
डी डी ऐ की ड्रा भी ऐसी सबका एक ही हाल
नाम बड़े और दर्शन छोटे सबको एक मलाल
सबको एक मलाल किया जो हरदम नया घोटाला
क्या कहने अफसर लोगों के क्लर्क बने अब लाला
लाला बन कर बैठ भी जाते तब भी बात थी अच्छी
कुछ पैसों की खातिर सबने अपनी ईमान ही बेचीं
नहीं भरोसा इनका कोई मगर है छत का सपना
एक ही सोच सबो के मन में घर बन जाए अपना
मगर चाल जब चले खिलाडी किसकी होगी हिम्मत
डी डी ऐ का घर मिल जाए कब तक झेले जहमत
इसीलिए अब तक दिल्ली में कटते गये कालोनी
अनधिकृत नाम दिया है जिसको जैसे हो अनहोनी
कैसे रोके इसे प्रशासन जो जनता की इच्छा
आसमान पर कीमत घर का कितनी करो समिचछा
बसते जायेंगे वरना कालोनी नियमित कहो या अनियमित
आख़िर इनके बस जाने में वे भी सदा हैं सम्मिलित से
नाम बड़े और दर्शन छोटे सबको एक मलाल
सबको एक मलाल किया जो हरदम नया घोटाला
क्या कहने अफसर लोगों के क्लर्क बने अब लाला
लाला बन कर बैठ भी जाते तब भी बात थी अच्छी
कुछ पैसों की खातिर सबने अपनी ईमान ही बेचीं
नहीं भरोसा इनका कोई मगर है छत का सपना
एक ही सोच सबो के मन में घर बन जाए अपना
मगर चाल जब चले खिलाडी किसकी होगी हिम्मत
डी डी ऐ का घर मिल जाए कब तक झेले जहमत
इसीलिए अब तक दिल्ली में कटते गये कालोनी
अनधिकृत नाम दिया है जिसको जैसे हो अनहोनी
कैसे रोके इसे प्रशासन जो जनता की इच्छा
आसमान पर कीमत घर का कितनी करो समिचछा
बसते जायेंगे वरना कालोनी नियमित कहो या अनियमित
आख़िर इनके बस जाने में वे भी सदा हैं सम्मिलित से
गुरुवार, 8 जनवरी 2009
सच को स्वीकार करना आसान नहीं है
सच को स्वीकार करना आसान तो नहीं है
जीने का हक़ हमारा अनुदान तो नहीं है
इस पर जो हो सियासत कब तक सहेंगे हम सब
आयेगा एक मसीहा पैगाम तो नहीं है
कश्मीर को ही देखो सदियों से जो हमारा
टुकडों में बंट गया और करता है वो गुजारा
कहते हैं जिसको जन्नत जोखिम भरा सफर है
सच तो यही है जैसे खोजे नया सहारा
कितना हुआ पलायन अनुमान भी नहीं है
सच को स्वीकार करना आसान तो नहीं है
वह पाक जो बना है नापाक हैं इरादे
होता नहीं भरोसा कितने ही कर ले वादे
आगे निकल गया वह आतंक के सफर में
वापस वो आए कैसे बदले सभी इरादे
परेसाऊ आज सब पर समाधान भी नहीं है
सच को स्वीकार करना आसान तो नहीं है
अजमल कसाब कब से करता रहा है मिन्नत
अपना वतन था प्यारा नहीं जाना और जन्नत
हैवान क्यों बनाया अच्छे भले थे घर में
घातक बनाया जालिम जीवन बना है जहमत
यह खून है वहीँ का पहचान तो मिली है
सच को स्वीकार करना आसान तो नहीं है
मजबूर हम नहीं पर मौका दिया है सोचो
मरहम लगाना सीखो जख्मों को न खरोचों
कातिल कहाँ कहाँ हैं तुमको तो सब पता है
सच को स्वीकार कर लो ईमान को न बेचो
बन कर रहो पड़ोसी समाधान तो यही है
सच को स्वीकार करना आसन भी तभी है
जीने का हक़ हमारा अनुदान तो नहीं है
इस पर जो हो सियासत कब तक सहेंगे हम सब
आयेगा एक मसीहा पैगाम तो नहीं है
कश्मीर को ही देखो सदियों से जो हमारा
टुकडों में बंट गया और करता है वो गुजारा
कहते हैं जिसको जन्नत जोखिम भरा सफर है
सच तो यही है जैसे खोजे नया सहारा
कितना हुआ पलायन अनुमान भी नहीं है
सच को स्वीकार करना आसान तो नहीं है
वह पाक जो बना है नापाक हैं इरादे
होता नहीं भरोसा कितने ही कर ले वादे
आगे निकल गया वह आतंक के सफर में
वापस वो आए कैसे बदले सभी इरादे
परेसाऊ आज सब पर समाधान भी नहीं है
सच को स्वीकार करना आसान तो नहीं है
अजमल कसाब कब से करता रहा है मिन्नत
अपना वतन था प्यारा नहीं जाना और जन्नत
हैवान क्यों बनाया अच्छे भले थे घर में
घातक बनाया जालिम जीवन बना है जहमत
यह खून है वहीँ का पहचान तो मिली है
सच को स्वीकार करना आसान तो नहीं है
मजबूर हम नहीं पर मौका दिया है सोचो
मरहम लगाना सीखो जख्मों को न खरोचों
कातिल कहाँ कहाँ हैं तुमको तो सब पता है
सच को स्वीकार कर लो ईमान को न बेचो
बन कर रहो पड़ोसी समाधान तो यही है
सच को स्वीकार करना आसन भी तभी है
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008
सबूत
सबूत १
अन्धकार गहराया फिर ले आतंकी का वेश
मानवता शर्माती जिससे डरता है परिवेश
डरता है परिवेश बिना कारण मरते लोग
अंग भंग भी हो जाते हैं कैसा है दुर्योग
ऊपर से कुछ देश इन्हें अब प्रश्रय भी देते हैं
समाधान देने के बदले अनुदान लेते हैं
पता सभी को कौन है जालिम कौन कहाँ बैठा है
लेकिन जल कर जाने क्यों वह जस्सी जैसा ऐंठा है
बनता है अनजान निरंतर भेजे जो बलवाई
करता है इनकार उन्हें जो उसके अपने भाई
कब तक चुप बैठेंगे अपने कब तक झूठ छिपेगा
कब तक मरेंगे उसके अपने कितना साजिश रचेगा
मांग रहा अब भी सबूत जो स्वतः प्रमाणित होता है
जितना भी समझाया उसको वह तो आपा खोता है
अगर नहीं जो माना फिर भी पडेगा उसको रोना
मिल जायेंगे सभी सबूत जब पडेगा उसको खोना
सबूत २
क्या सबूत दे भारत उसको जिसकी आँखें बंद
समझ नहीं है सच का जिसको लगा रहा पैबंद
लगा रहा पैबंद निरंतर धोखा दे दुनिया को
करता है इनकार मगर पहचान जहा अपनों को
कैसे बोले उनको अपना सब अल्लाह के बन्दे
जिनकी करनी है कुछ ऐसी कहते हैं सब गंदे
मगर आग अब लगी दिलों में दोनों और बराबर
दर्द सभी का है समान पर करता सदा निरादर
लड़ने को आतुर बैठा वह देकर जिनको संरक्षण
कल को कालिख मलेंगे वे ही कर जायेंगे भक्षण
ऐसे में बनता सबूत जो जनता उसको देगी
कौन है अपना कौन पराया सबका लेखा लेगी
अन्धकार गहराया फिर ले आतंकी का वेश
मानवता शर्माती जिससे डरता है परिवेश
डरता है परिवेश बिना कारण मरते लोग
अंग भंग भी हो जाते हैं कैसा है दुर्योग
ऊपर से कुछ देश इन्हें अब प्रश्रय भी देते हैं
समाधान देने के बदले अनुदान लेते हैं
पता सभी को कौन है जालिम कौन कहाँ बैठा है
लेकिन जल कर जाने क्यों वह जस्सी जैसा ऐंठा है
बनता है अनजान निरंतर भेजे जो बलवाई
करता है इनकार उन्हें जो उसके अपने भाई
कब तक चुप बैठेंगे अपने कब तक झूठ छिपेगा
कब तक मरेंगे उसके अपने कितना साजिश रचेगा
मांग रहा अब भी सबूत जो स्वतः प्रमाणित होता है
जितना भी समझाया उसको वह तो आपा खोता है
अगर नहीं जो माना फिर भी पडेगा उसको रोना
मिल जायेंगे सभी सबूत जब पडेगा उसको खोना
सबूत २
क्या सबूत दे भारत उसको जिसकी आँखें बंद
समझ नहीं है सच का जिसको लगा रहा पैबंद
लगा रहा पैबंद निरंतर धोखा दे दुनिया को
करता है इनकार मगर पहचान जहा अपनों को
कैसे बोले उनको अपना सब अल्लाह के बन्दे
जिनकी करनी है कुछ ऐसी कहते हैं सब गंदे
मगर आग अब लगी दिलों में दोनों और बराबर
दर्द सभी का है समान पर करता सदा निरादर
लड़ने को आतुर बैठा वह देकर जिनको संरक्षण
कल को कालिख मलेंगे वे ही कर जायेंगे भक्षण
ऐसे में बनता सबूत जो जनता उसको देगी
कौन है अपना कौन पराया सबका लेखा लेगी
गुरुवार, 25 दिसंबर 2008
काश की हम पंछी बन जाते
काश की हम पंछी बन जाते
नील गगन में उड़ते जाते
सीमा सरहद कुछ न होता
हँसते गाते बस मुस्काते
काश की हम पंछी बन जाते
कुदरत का अनमोल खजाना
मकसद होता उसे सजाना
शाम सुहानी सबकी होती
गुन गुन गाते न घबराते
काश की हम पंछी बन जाते
बगिया होती सबको प्यारी
सबके सब होते अधिकारी
करते चुहल कभी आपस में
अपनों को हंस कर अपनाते
काश की हम पंछी बन जाते
अपनी सबको आज पड़ी है
अनचाही दिवार खड़ी है
इतने ऊँचे पहुँच नहीं पर ,
पर होते तो पार कराते
काश की हम पंछी बन जाते
नील गगन में उड़ते जाते
सीमा सरहद कुछ न होता
हँसते गाते बस मुस्काते
काश की हम पंछी बन जाते
कुदरत का अनमोल खजाना
मकसद होता उसे सजाना
शाम सुहानी सबकी होती
गुन गुन गाते न घबराते
काश की हम पंछी बन जाते
बगिया होती सबको प्यारी
सबके सब होते अधिकारी
करते चुहल कभी आपस में
अपनों को हंस कर अपनाते
काश की हम पंछी बन जाते
अपनी सबको आज पड़ी है
अनचाही दिवार खड़ी है
इतने ऊँचे पहुँच नहीं पर ,
पर होते तो पार कराते
काश की हम पंछी बन जाते
मंगलवार, 23 दिसंबर 2008
बयान
बयान १
धुले नहीं हैं अंतुले जिनकी तेज जुबान
नजरें अब तक ऊँची कैसे देकर ग़लत बयान
देकर कोरी बयान मसीहा बनने का था सपना
ऊपर वाले से डरते हैं क्या कर लेगा अपना
ऊपर वाला शरम के मारे न जाने क्या सोचे
लेकिन निचे वाले कब तक अपने बालों को नोचे
हालत है गंभीर मगर उनको अपनी ही पड़ी है
पाक बना बैठा है पागल जिसकी सरकार अडी है
वक्त नजाकत समझो प्यारे बदलो अपनी करनी
कहते स्वयं को देश भक्त तो शर्माती है धरनी
बयान २
सजग हुई सरकार अब देने लगी बयान
लगता है होने वाला है जल्दी हीं मतदान
जल्दी हीं मतदान नहीं है उनको कोई फुरसत
आतंकी पहले भी आकर दिखलाते थे फितरत
अब तक अपने आका मोहन बजा रहे थे बंशी
ताज नरीमन ओबेराय में बजी इसी से घंटी
चलो देर से आए लेकिन होगी कभी समीक्षा
जीना सबका अधिकार है नहीं कहीं से भिक्षा
युद्ध करो या कूट नीति पर बंद करो तुम रोना
घुट घुट कर जीने से अच्छा एक बार है मरना
धुले नहीं हैं अंतुले जिनकी तेज जुबान
नजरें अब तक ऊँची कैसे देकर ग़लत बयान
देकर कोरी बयान मसीहा बनने का था सपना
ऊपर वाले से डरते हैं क्या कर लेगा अपना
ऊपर वाला शरम के मारे न जाने क्या सोचे
लेकिन निचे वाले कब तक अपने बालों को नोचे
हालत है गंभीर मगर उनको अपनी ही पड़ी है
पाक बना बैठा है पागल जिसकी सरकार अडी है
वक्त नजाकत समझो प्यारे बदलो अपनी करनी
कहते स्वयं को देश भक्त तो शर्माती है धरनी
बयान २
सजग हुई सरकार अब देने लगी बयान
लगता है होने वाला है जल्दी हीं मतदान
जल्दी हीं मतदान नहीं है उनको कोई फुरसत
आतंकी पहले भी आकर दिखलाते थे फितरत
अब तक अपने आका मोहन बजा रहे थे बंशी
ताज नरीमन ओबेराय में बजी इसी से घंटी
चलो देर से आए लेकिन होगी कभी समीक्षा
जीना सबका अधिकार है नहीं कहीं से भिक्षा
युद्ध करो या कूट नीति पर बंद करो तुम रोना
घुट घुट कर जीने से अच्छा एक बार है मरना
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